माटिएके बनल शरीर फेर : Gena Yadav



घमण्डक बीज लगाक' नफरत उब्जा रहल छी एक-दोसराके गरदनी काटिक' खुन सँ नहा रहल छी नहि किछु ल'क' एलौ, नहि किछु ल'जेबाक अछि माटिएके बनल शरीर फेर माटिए भ'जेबाक अछि
सबहक एक मानव जाती, जाइत-पाइतके कात करु अहंकारके आगिमे जराक, प्रेमसँ जिनगी सुरुवात करु कियो छोट नहि कियो बढ्का, सबकियोके सम्मान करु मनुख योनिमे जनमल छी, एहि बातपर गुमान करु
चारी दिनक इ जिनगी छै, हंसी खुशी सँ काइट लिय नइ ककरो दिल दुखाउ, दर्द सबहक बाँइट लिय घमण्डक बीज लगाक' नफरत उब्जा रहल छी
एक-दोसराके गरदनी काटिक' खुन सँ नहा रहल छी

गेना यादव





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